UPI: आज जब हम किसी दुकान या छोटे व्यापारी के यहाँ मोबाइल से क्यूआर कोड स्कैन करके भुगतान करते हैं, तो हमें यह बेहद आसान और मुफ्त लगता है। लेकिन क्या यह लेन-देन वास्तव में मुफ्त है? सच यह है कि इस सेवा को चालू रखने के लिए एक बड़ा ढांचा और खर्च मौजूद है, जिसे अब तक सरकार सब्सिडी के जरिए पूरा करती रही है। मगर हाल ही में सरकार ने इस सब्सिडी को घटाने का फैसला लिया है, जिससे यूपीआई सेवा प्रदाताओं के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं।
सरकार ने कम की यूपीआई इंसेंटिव सब्सिडी

वित्त मंत्रालय ने छोटे व्यापारियों पर होने वाले यूपीआई लेन-देन पर मिलने वाले इंसेंटिव को घटा दिया है। पहले प्रति 100 रुपये के लेन-देन पर बैंकों को 0.25 रुपये मिलते थे, जबकि अब यह घटकर केवल 0.15 रुपये रह गया है। इतना ही नहीं, 2023-24 में जहाँ सरकार ने 3,500 करोड़ रुपये से अधिक का बजट इस योजना के लिए रखा था, वहीं 2024-25 में इसे घटाकर मात्र 1,500 करोड़ रुपये कर दिया गया है। यह कटौती सीधे तौर पर बैंकों और भुगतान सेवा प्रदाताओं की आमदनी को प्रभावित करेगी।
क्यों बदलना पड़ सकता है बिज़नेस मॉडल
उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार सब्सिडी कम होने के कारण यूपीआई प्रदाताओं को अपने बिज़नेस मॉडल में बदलाव करना पड़ सकता है। छोटे मूल्य के लेन-देन पर खर्च बढ़ना अब उनके लिए एक गंभीर चिंता बन चुका है। भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी हाल ही में संकेत दिए कि “फ्री लंच अब खत्म होने वाला है।” उनका कहना है कि किसी भी महत्वपूर्ण ढाँचे को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने के लिए उसकी लागत किसी न किसी रूप में चुकानी होगी।
डिजिटल इंडिया के सपने और असलियत
जब नोटबंदी और कोविड-19 जैसी परिस्थितियों में डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की ज़रूरत थी, तब सरकार ने सब्सिडी देकर इस व्यवस्था को मजबूत किया। छोटे व्यापारियों और आम लोगों को डिजिटल भुगतान अपनाने के लिए प्रेरित किया गया। लेकिन अब जब यूपीआई करोड़ों लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है, तो सवाल यह उठता है कि क्या सरकार हमेशा इस खर्च को उठाती रहेगी या धीरे-धीरे इसका बोझ जनता या प्रदाताओं पर डाला जाएगा।
छोटे व्यापारियों पर क्या होगा असर

सब्सिडी में कटौती का सीधा असर छोटे व्यापारियों और ग्रामीण क्षेत्रों पर हो सकता है। यूपीआई का सबसे बड़ा लाभ यह रहा है कि यह छोटे दुकानदारों से लेकर बड़े ब्रांड तक सभी को डिजिटल भुगतान की सुविधा देता है। अगर प्रदाता अपने खर्च की भरपाई के लिए कोई शुल्क लगाना शुरू कर देते हैं, तो इसका बोझ आम उपभोक्ता और छोटे व्यापारी दोनों पर पड़ सकता है। यह स्थिति डिजिटल भुगतान को अपनाने की रफ्तार को भी धीमा कर सकती है।
यूपीआई ने भारत की डिजिटल क्रांति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। यह केवल भुगतान का माध्यम नहीं बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और भरोसे का प्रतीक बन चुका है। लेकिन बदलते हालात और घटती सरकारी सब्सिडी ने इस पर भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि प्रदाता किस तरह अपने बिज़नेस मॉडल को बदलते हैं और क्या डिजिटल भुगतान का यह सफर अब भी आम जनता के लिए सहज और सस्ता रह पाएगा।
डिस्क्लेमर: यह लेख उपलब्ध मीडिया रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की राय पर आधारित है। वास्तविक निर्णय और नीतियाँ सरकार एवं संबंधित संस्थानों पर निर्भर करती हैं। इसका उद्देश्य केवल जानकारी देना है, न कि किसी वित्तीय परामर्श की पेशकश करना।